🌸 आरती 🌸
जगमग-जगमग जोत जगी है,
मोहन आरती होन लगी है |
पर्वत खोली का सिंहासन,
जिस पर मोहन लागते आसन |
आ मंदिर में देते भाषण,
उस मोहन की जोत जगी है |
जगमग-जगमग जोत जगी है,
मोहन आरती होन लगी है |
कलयुग में अवतार लियो है,
पर्वत ऊपर वास कियो है |
गाँव मिलकपुर मंदिर तेरा,
जहाँ दुखियों का लग रहा डेरा |
ज्ञान का वहाँ भंडार भरा है,
सीताफल का वृक्ष खड़ा है |
उस मोहन की जोत जगी है |
जगमग-जगमग जोत जगी है,
मोहन आरती होन लगी है |
यहाँ पर दिल तुम रखो सच्चा,
सभी हैं इसमें बूढ़ा बच्चा |
प्रेम से मिलकर शाक्कर बाटो,
बाबा जी का जोहड़ छांटो |
उस मोहन की जोत जगी है |
जगमग-जगमग जोत जगी है,
मोहन आरती होन लगी है |
अंधे को तुम नेत्र देते,
कोढ़िन को देते हो काया |
बांझन को तुम पुत्र देते,
निरधन को देते हो माया |
जगमग-जगमग जोट जगी है,
मोहन आरती होन लगी है |
सीला जी को तुम दर्शाये,
गाँव मिलकपुर मंदिर बनवाये |
शिवजी जी का वास कराये,
अपनी माया को दर्साये |
जगमग-जगमग जोत जगी है,
मोहन आरती होन लगी है |
मेरी गुरु की यही विन्ती,
प्रेम से मिलकर बोलो आरती |
जगमग-जगमग जोत जगी है,
मोहन आरती होन लगी है |