🙏 चालीसा - बाबा मोहन राम 🙏

🌸 चालीसा 🌸

जै मन मोहन जग विख्याता |
दीन दुखियों के तुम हो दाता ||
तुम्हरो ध्यान सभी जन धरते |
तुम रक्षा भक्तों की करते ||

काली खोली बास तुम्हारा |
करे सभी जग का निस्तारा ||
ज्योति गुफा में प्यारी जलती |
दूर दूर से दुनिया आती ||
राजिस्थान मिलकपुर ग्राम |
सुन मोहन का सुन्न धाम ||
यहाँ पर जन आ करे बसेरा |
हर दम मारे मोहन फेरा ||

ज्योति मे ज्योति मिलाओ मन की |
निस दिन सेवा कर मोहन की ||
जो कोई करत मन से सेवा |
मोहन पार लगावे खेवा ||
सेवा यही हृदय मे धर लो |
सबको छोड़ बाप एक कर लो ||

मन को करो न डामा डोल |
दुनिया समझो पोलम पोल ||
अब सुनो सुनाओ मोहन गाथा |
नर और नारी रगड़े माथा ||
पागल भी आ रज में लेटे |
बांझ नार को दे रहे बेटे ||
ऐसे मोहन भोले भाले |
दुखियो के दुःख हरने वाले ||

कोढ़िन को वो देते काया |
निर्धन को भर देते माया ||
अंतरयामी मोहन राम |
अड़े समारे सबके काम ||
भूत प्रेत निकट नहीं आवे |
मोहन नाम सुनत भग जावे ||

घी की ज्योति जले दिन बांकी |
मंदिर में मोहन के झांकी ||
सीता फल की गहरी छाया |
सोरन कर दई कोढ़िन काया ||
और सुनो मोहन करतूत |
साठ साल की ले रही पूत ||
नर नारी आ खाबे खींचर |
चुग रहे चुग्गा मोर कबूतर ||

परबत ऊपर बढ़ लहरावे |
दरश करत जन अति सुख पावे ||
प्रेम भक्ति से जो तुम्हें ध्यावे |
दुःख दारिद्र निकट नहीं आवे ||
मैं मनमोहन दीन घनेरो |
तुम बिन कौन हरे दुःख मेरो ||

काम क्रोध मद लोभ न सतावे |
रिपु मन मोह अति भरमावै ||
करुऊ कृपा मम खोली वाला |
दास जान मोह करो निहाला ||
जब तक जीऊ दरश तेरो पाऊं |
निस दिन ध्यान चरन रज खाऊं ||
कलयुग मैं तेरी कला सवाई |
कथी न जाय तेरी प्रभुताई ||

तेरी अजब निराली भान |
सत बुद्धि दो मोहन आन ||
हरदम सेवा करू तुम्हारी |
धुप दीप नेवेद्य पान सुपारी ||
रोम रोम में मोहन राम |
स्वास स्वास में तुम्हारा नाम ||

मैं अति दीन गरीब दुखहारी |
हरो कलेश भय भंजन भारी ||
नित्य प्रति पांच पाठ कर भाई |
लोक लाज करि सब देओ भुलाई ||
मोहन चालीसा पढ़े पढ़ावे |
अंत समय मोक्ष पद पावे ||
पीछे ना कोई रहे कलेश |
सीधा पहुँचे मोहन देश ||

अब भी मूरख कर कुछ चेत |
अपने उर में मोहन देख ||
विनती यही मेरी अरदास |
मुझे बना लो अपना दास ||
निस दिन तेरी सेवा चाहूँ |
जनम जनम ना नाम भुलाऊ ||
तेरी भक्ति करो हमेश |
मेरी तुम से यही सन्देश ||

मेरी बोझिल जर जर नईया |
तुम बिन मोहन कौन खिवैया ||
राधे याम ना चाहे मान |
तेरे चरनों में निकले प्रान ||

|| दोहा ||

ज्योति जले उर भियसती ठंडे बढ़ की छाय
मोहन राम मुंशी रटत हरदम घट से माय

|| इति श्री मोहन राम चालीसा ||

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